<p style=”text-align: justify;”><strong>Monsoon 2026: </strong>मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून की दस्तक के साथ देशभर में बारिश का दौर शुरू हो गया है. धर्म और ज्योतिष में वर्षा को केवल मौसम में बदलाव नहीं, बल्कि प्रकृति और देव कृपा का प्रतीक माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि समय पर होने वाली वर्षा धरती पर सुख, समृद्धि और जीवन का संदेश लेकर आती है.</p>
<p>मानसून की दस्तक के साथ ही कई राज्यों में तेज हवाओं, धूल भरी आंधी और भारी बारिश के बीच ऑरेंज अलर्ट (Orange Alert) जारी किया गया है. ऐसे में मानसून को लेकर धार्मिक मान्यताएं भी चर्चा में हैं, जिनमें वर्षा को इंद्र देव की कृपा और प्रकृति के संतुलन का संकेत माना गया है.</p>
<p><iframe title=”YouTube video player” src=”https://www.youtube.com/embed/jEMwmtNvMz0?si=_Na0Zp8rLgsQYqU8″ width=”560″ height=”315″ frameborder=”0″ allowfullscreen=”allowfullscreen”></iframe></p>
<p style=”text-align: justify;”>प्राचीन समय से ही वर्षा को ईश्वर की कृपा और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक माना जाता है. प्राचीन काल से लेकर आज के समय भी अच्छी वर्षा के लिए इंद्र देव की पूजा और यज्ञ-अनुष्ठान किए जाते हैं. हमारे वेद, पुराण और धार्मिक ग्रंथों में भी मानसून और वर्षा का उल्लेख मिलता है. श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) के 14वें श्लोक में कहा गया है- <em><strong>अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।</strong></em></p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>अर्थ है-</strong> सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा (पर्जन्य) से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ नियत कर्मों से उत्पन्न होता है.</p>
<p style=”text-align: justify;”>ऋग्वेद में इंद्र को सबसे शक्तिशाली देवताओं में से एक माना गया है, जो वर्षा, मेघ और बिजली के अधिपति हैं. मान्यता है कि इंद्र देव की कृपा से धरती पर वर्षा होती है, अन्न उत्पादन संभव हो पाता है और प्राणियों का भरण-पोषण होता है. पौराणिक कथाओं में ऐसा उल्लेख मिलता है कि, समाज में जब धर्म, सत्य और सदाचार का पालन करता है तो प्रकृति भी अनुकूल रहती है और वर्षा भी अनुकूल होती है.</p>
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<p style=”text-align: justify;”><strong>क्या होती है अतिवृष्टि और अनावृष्टि?</strong></p>
<p style=”text-align: justify;”>लेकिन कई बार वर्षा का रूप अतिवृष्टि और अनावृष्टि में बदल जाता है, जिसे मानव और प्रकृति के बीच बिगड़े संतुलन का परिणाम माना गया है. इसे दैवीय या प्राकृतिक प्रकोप भी माना जाता है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>अनावृष्टि (drought)-</strong> अनावृष्टि का अर्थ सूखा से है. विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, धरती पर जब अधर्म, लोभ, और पाप बढ़ते हैं और राजा/शासक प्रजा पालक नहीं रहते, तब अनावृष्टि होती है. इसे इस बात का संकेत माना जाता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच का संतुलन टूट चुका है.</p>
<p style=”text-align: justify;”><strong>अतिवृष्टि (excess rain)-</strong> अतिवृष्टि का अर्थ अधिक वर्षा या बाढ़ जैसे हालात से है. जैसे भागवत पुराण में श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की कथा- जब इंद्र के अहंकार के कारण भयंकर अतिवृष्टि हुई थी. ऋग्वेद और ज्योतिषीय मतानुसार, अत्यधिक लालच, वनों की कटाई और पृथ्वी के दोहन से जब संतुलन बिगड़ता है, तब प्रकृति प्रकोप के रूप में अतिवृष्टि कर अपना संतुलन बनाती है.</p>
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<p style=”text-align: justify;”><strong>Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि <span class=”skimlinks-unlinked”>ABPLive.com</span> किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.</strong></p>






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