समुद्र की हजारों फीट गहराई में कैसे मिलता है सिग्नल! जानिए संपर्क साधने के लिए Submarines किस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं

<p style=”text-align: justify;”><strong>Signal in Submarines:</strong> समुद्र की गहराइयों में मौजूद पनडुब्बियां <a href=”https://www.abplive.com/technology/how-the-internet-is-actually-created-which-travels-from-one-country-to-another-via-undersea-cables-3115154″>(Submarines)</a> आधुनिक सैन्य तकनीक का एक अहम हिस्सा हैं. ये पानी के भीतर हजारों फीट की गहराई तक जाकर लंबे समय तक काम कर सकती हैं. लेकिन एक बड़ा सवाल हमेशा लोगों के मन में आता है कि जब मोबाइल फोन का नेटवर्क जमीन पर भी कई बार कमजोर पड़ जाता है तो आखिर समुद्र की गहराई में मौजूद पनडुब्बियां अपने बेस या अन्य जहाजों से संपर्क कैसे बनाए रखती हैं? इसके पीछे बेहद दिलचस्प और एडवांस टेक्नोलॉजी काम करती है.</p>
<h2 style=”text-align: justify;”>पानी के अंदर क्यों नहीं काम करते सामान्य रेडियो सिग्नल?</h2>
<p style=”text-align: justify;”>हमारे मोबाइल फोन और नॉर्मल संचार डिवाइस रेडियो तरंगों (Radio Waves) के जरिए काम करते हैं. लेकिन समुद्री पानी बिजली का अच्छा चालक होता है जिसके कारण उच्च आवृत्ति वाले रेडियो सिग्नल कुछ ही मीटर के भीतर कमजोर हो जाते हैं. यही वजह है कि समुद्र की गहराई में मोबाइल नेटवर्क या सामान्य वायरलेस संचार लगभग असंभव हो जाता है.</p>
<h2 style=”text-align: justify;”>पनडुब्बियां कैसे भेजती और प्राप्त करती हैं संदेश?</h2>
<p style=”text-align: justify;”>पनडुब्बियों के लिए विशेष प्रकार की बेहद कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों (Very Low Frequency – VLF) और बहुत कम फ्रीक्वेंसी वाली तरंगों (Extremely Low Frequency – ELF) का इस्तेमालल किया जाता है. इन तरंगों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये समुद्री पानी के भीतर काफी गहराई तक पहुंच सकती हैं.</p>
<p style=”text-align: justify;”>हालांकि इनकी डेटा ट्रांसफर क्षमता बहुत कम होती है. इसका मतलब है कि इनके जरिए केवल छोटे मैसेज या ऑर्डर ही भेजे जा सकते हैं. बड़े डेटा, वीडियो या लंबी जानकारी भेजना संभव नहीं होता.</p>
<h2 style=”text-align: justify;”>जब जरूरी हो तो सतह के करीब आती है पनडुब्बी</h2>
<p style=”text-align: justify;”>अगर किसी पनडुब्बी को बड़ी मात्रा में डेटा प्राप्त करना हो या विस्तृत संवाद करना हो तो उसे समुद्र की सतह के करीब आना पड़ता है. इस दौरान वह अपने विशेष एंटेना या संचार मस्तूल (Communication Mast) को बाहर निकालती है और फिर सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम से जुड़ती है. सैटेलाइट लिंक के जरिए पनडुब्बी अपने मुख्यालय, युद्धपोतों और अन्य सैन्य इकाइयों से तेज गति से डेटा का आदान-प्रदान कर सकती है.</p>
<h2 style=”text-align: justify;”>साउंड वेव भी निभाती हैं अहम भूमिका</h2>
<p style=”text-align: justify;”>पानी के भीतर साउंड वेव रेडियो सिग्नल की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से ट्रैवल करती हैं. इसी कारण पनडुब्बियां सोनार (SONAR) तकनीक का इस्तेमाल करती हैं. हालांकि सोनार मुख्य रूप से आसपास की वस्तुओं, जहाजों और बाधाओं का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में साउंड बेस्ड संचार तकनीक भी इस्तेमाल की जा सकती है.</p>
<h2 style=”text-align: justify;”>भविष्य में और बेहतर होगी तकनीक</h2>
<p style=”text-align: justify;”>वैज्ञानिक लगातार ऐसी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो समुद्र की गहराइयों में तेज और सुरक्षित संचार को संभव बना सकें. लेजर आधारित अंडरवॉटर कम्युनिकेशन और एडवांस ध्वनिक नेटवर्क जैसी तकनीकों पर शोध जारी है. आने वाले वर्षों में पनडुब्बियों का संचार पहले से कहीं अधिक तेज, सुरक्षित और प्रभावी हो सकता है.</p>
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