Kurma Jayanti 2026: कूर्म जयंती की पूजा में जरूर पढ़ें ये कथा, जानें श्रीहरि को क्यों लेना पड़ा कछुआ का अवतार

<p style=”text-align: justify;”><strong>Kurma Jayanti 2026 Katha in Hindi: </strong>भगवान विष्णु का जगत का पालनहार कहा जाता है. क्योंकि जब-जब संसार या मानव जाति में संकट आया, भगवान अलग-अलग अवतारों में जनकल्याण किया. राम-कृष्ण से लेकर बुद्ध और मछली-कछुआ जैसे अवतारों में हर युग में भगवान विष्णु प्राकट्य हुए.</p>
<p style=”text-align: justify;”>विष्णु जी के कई अवतारों में एक है कच्छप (कछुआ) अवतार. इसे भगवान के दशावतारों में दूसरा अवतार माना जाता है. धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख महीने की पूर्णिमा तिथि पर श्रीहरि ने कच्छप अवतार लिया था. इसलिए इस दिन को कूर्म जयंती के रूप में मनाया जाता है.</p>
<p style=”text-align: justify;”>आज 1 मई 2026 को वैशाख पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जा रहा है. आज के दिन भगवान के कूर्म अवतार की पूजा का विधान है. पूजा के लिए शाम 06:17 से 06:56 तक का समय रहेग. पूजा में भगवान के कूर्म अवतार से जुड़ी इस कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, तभी पूजा का पूर्ण फल मिलता है.</p>
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<p><strong>कूर्म जयंती पौराणिक कथा</strong></p>
<p>पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण इंद्र समेत सभी देवतागण शक्तिहीन हो गए थे. ऋषि के श्राप से मुक्ति पाने के लिए सभी देवतागण भगवान विष्णु के पास मदद के लिए पहुंचे. विष्णुजी ने समुद्र मंथन करने की सलाह दी. विष्णु जी ने कहा कि, समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा, जिसे पीने से देवों की शक्ति लौट जाएगी. लेकिन ऋषि के श्राप के कारण देवता निर्बल हो चुके थे, जिस कारण समुद्र मंथन का काम आसान नहीं था.</p>
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<p>तब देवताओं ने विचार किया कि, देवता और दानव दोनों मिलकर समुद्र मंथन करेंगे. अमृत की लालसा के कारण दानव भी मान गए और फिर मंद्राचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी के स्थान पर प्रयोग कर समुद्र मंथन का कार्य शुरू हुआ. समुंद्र मंथन से 14 बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुईं, लेकिन अमृत निकलने से पहले ही पर्वत समुद्र में धंस कर डूबने लगा.</p>
<p>तभी भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर अपनी पीठ पर मंद्राचल पर्वत का भार उठाया. भगवान की पीठ को आधार बनाकर फिर से समुद्र को मथा गया और आखिरकार अमृत कलश निकला. कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के कच्छप अवतार में कछुए के पीठ का व्यास 100,000 योजन था. भगवान विष्णु के कच्छप अवतार के कारण ही समुद्र मंथन का कार्य संभव हो सका और देवताओं को उनकी शक्ति फिर से मिली.</p>
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